Monday, August 14, 2023
Friday, August 11, 2023
दश महाविद्या
योग में मुद्रा
योगासनों में मुद्राओं का बहुत महत्व है।
विशेष बन्ध के साथ किए जाने पर ये विशेष लाभ देते हैं। विशेष अंगों को आसनों से स्थिर करके विशेष प्राणायाम कर विशेष बन्ध लगाने के कई फायदे होते हैं।
उदाहरण
उत्तानपादासन के साथ यदि कुम्भक किया जाए और अश्व चालिनी मुद्रा भी की जाए, तो यह पेट की सभी समस्याओं में लाभकारी हो जाता है।
before yoga asana
few things first
these are not like other exercises, drills, calisthenics. so you need to work out the exact methods and instructions required for sidhdhi of an asana.
yogasana work on the internal vital organs , nadi and nervous system so do not use them like other body exercises.
body requires some time (which is different for different persons) to assimilations.
asana sidhdhi require at least 4 to 6 months. so do not change the asana frequently to mature the benefits that an asana can give.
decide what are your needs from asana
if you are a sitting for 8 hours on one place personality then start from sarpasana and dhanurasana.
you are moving on a two wheeler all the working hours then start with shavasana and sukhasana.
stretch the body only 75% of your capacity . everyday it will increase the stretch inch by inch .
so decide your goals first then you can choose asana.
since the asana work on the nadis , it is necessary to get the primary knowledge of the pranayama. if you do follow the instructions on pranayama on each asana the fruitful results are way greater than without the pranayama.
any food intake should be avoided for at least 3 hours this side and that side of the asana.
Tuesday, July 26, 2022
शिवरात्रि
Saturday, February 12, 2022
काल
Monday, December 27, 2021
न्यास क्या क्यों और कैसे
Sunday, December 12, 2021
सम्पुट
Wednesday, December 19, 2018
पूर्वज पुरखों की दिशा होती है।
मृत्यु की दिशा होती है।
अमात्य की दिशा होती है।
- चेतना को ब्रह्म के ज्ञान में स्थिर करना
- सभी इन्द्रिय-जनित सुखों में संयम बरतना
Wednesday, August 23, 2017
lullaby of the God
I call it lullaby of the God- gift of the god . the breath . the controlling switch of the body.
the breath has two parts the air itself and the life contained in the air.
गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपव्हये श्रियम् ।। --श्रीसूक्त
Invitation to you Goddess . with each breath you incessantly strengthen life to us . the life part in all living bodies.
for the air part we call it shwas श्वास and for the life part of the air we call it प्राण. that is why pranayam is not simply the inhaling and exhaling exercise. the important part is the attention towards the life part.
In a single breath cycle there are five different stages of this life part.
PRAN
APAN
VYAN
UDAN
SAMAN
when the air travels, is churned through, these five stages the life is bestowed to the BRAHMA the living essence of our existence.
shavasan
second method is little different. we very well know breath governs the activity and vice versa. when you are tense your breath length becomes shorter and faster. and vice versa. so the method is to lengthen your breath increasing it comfortably ( without having to make any extra effort) first watch the length of your breath for some time then let it be deeper and more deeper with each breath . you can feel the breath reaching to all your limbs after a few days practice. Now turn your speed of the breath slower and again you need to do this effortlessly one by one with each breath turning slower than the earlier one. you will reach to a level when you will fall asleep.
this will automatically erase tensions of the body.
I call it lullaby of the God- the gift of the god . the breath . the controlling switch of the body.
third method is by kumbhak a method of pranayam. Kumbhak is in street language is to stop the breath either holding the breath air inside(anter kumbhak) or holding breath air outside(bahya kumbhak). before starting on this method consult physician about holding breath does not make any problem to you .
start by tightening your body at the maximum possible. take a deep breath and hold the breath inside at least for a three normal breath lengths . this length varies with different body. release both at the same time forcefully. ideally at 1/3rd of the time you normally breath. loosen all the body parts at once. do not inhale air for again for 1/3rd of the time you normally breath. then start normal breathing. you achieve the same relaxing position as in the first method but in a few seconds.
Saturday, August 5, 2017
मौसमी सर्दी को बिना दवा के योग से ठीक कर सकते हैं।
मौसम के बदलाव से होने वाली सर्दी खाँसी हल्का बुखार होना आम बात है। इसके लिए महंगी दवाओं की ज़रूरत नहीं है। खासकर जो दवाएँ ड्राइव करने से मना करती हैं। इन दवाओं का असर थोड़ी देर तक ही रहता है। और दो तीन दिनों से लेकर सप्ताह भर तक समस्या बनी रहती है। इसे थोड़े से ध्यान से भी ठीक किया जा सकता है।
किसी भी ऐसे आसन में बैठें जिसमें आप की रीढ़ पृथ्वी से 90 डिग्री पर रहे। रीढ सीधी रख कर , श्वास धीमा और गहरा करें। सारे शरीर को ढीला करें। ध्यान को उस जगह पर ले आऐं जहाँ मुख नली और श्वास नली मिलती हैं। चेहरे को क्षितिज रेखा (horizontal plane)से लगभग 23 डिग्री उपर उठा लें । एक बार मुँह और एक बार बाँयी नाक से श्वास लेने का क्रम स्थापित करें। यह जरुरी है कि श्वास में जोर न लगाया जाय।
केवल इतना क्रम दिन में तीन चार बार दुहरा लेने से समस्या हल हो जाती है।
हठ योग सूत्र से मन का कण्ट्रोल
मारुतस्य लयो नाथः स लयो नादमाश्रितः ।। --हठ योग प्रदीपिका
शिव जी कहते हैं- इन्द्रियों का स्वामी मन होता है । मन का स्वामी श्वास होता है।
श्वास का स्वामी लय है। यह लय नाद पर आश्रित है।
गूढ़ सूत्र बहुत कुछ बहुत थोड़े में कहता है।
विपरीत दिशा से पढ़ें तो नाद की सिद्धि आपको जीवन की , मन की , शरीर की , प्रकृति से तादात्म्य की लय देता है। नाद की साधना से आप लय rhythm को पा सकते हैं । लय श्वास पर अधिकार की कु़ञ्जी , चाबी है। इसी श्वास से मन संचालित होता है।
यदि श्वास की लयबद्धता को पा लिया तो , मन का साधन मिल जाता है। प्रत्येक शरीर का एक नैचुरल rhythmic pattern होता है। सूत्र की मानें तो बहुत कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। अपने श्वास के इस सहज पैटर्न को ध्यान में लाना है। श्वास की कुछ विशेषताओं पर गौर करना है। चन्द्र और सूर्य स्वर का पैटर्न, श्वास की गति, श्वास की गहराई और इसका बदलाव भर ध्यान में लाना है।
Thursday, August 3, 2017
सूर्य और चन्द्र दोनों प्रकृति में हमारे समय का मापदण्ड तय करते हैं
सूर्य से हम वर्ष की गणना करते हैं। यह वर्ष के ऋतुओं की भी गणना करता है।
चन्द्र से दिन (तिथि ) की और पखवाडे तथा मास की गणना करते हैं।
समय को काल भी कहा जाता है। तो यदि हमें काल को समझना है तो सूर्य और चन्द्र को और इनकी गति को ध्यान में लाना आवश्यक है।
यदि ध्यान किया जाए तो पता चलता है कि हम एक समय मेें एक ही नासाद्वार से श्वास लेते हैं। इसे हम स्वर कहते हैं। दाहिने नासाद्वार के श्वास को सूर्य स्वर और बाँई नाक के श्वास को चन्द्र स्वर कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि सूर्य स्वर सूर्य से तथा चन्द्र स्वर चन्द्र से संचालित होता है। शरीर के तापमान और उससे शरीर में होने वाले परिवर्तन इन्हीं दोनों सूर्य और चन्द्र से संचालित होते हैं।
सूर्य ऊष्मा को बढाता है चन्द्र शीतलता को बढाता है। इस ऊष्मा के आवागमन और उसकी गति को नियन्त्रित किया जा सकता है।
इसे स्वर साधना कहते हैं।
पहला चरण
इस साधना का पहला चरण है सूर्य का अनुभव . प्रतिदिन आपको सूर्य की गति का ध्यान करना है। प्रारम्भ के लिए आप सूर्योदय सूर्यास्त और मध्यान्न के समय को ध्यान में लाना शुरू करें। कुछ दिनों के अभ्यास से आप पाएंगे कि आप बिना घड़ी देखे इनका सही समय बता सकते हैं। दिन के पूर्ण काल का भी अनुभव करने लगेंगे। दिन के पूर्ण काल को चार भागों में बाँटना शुरू करें । आप पाएँगे कि शुरू में यह विभाजन प्रतिदन थोड़ा थोड़ा बदल जाता है। यह सूर्य की गति के वर्तमान परिवर्तन हैं। इसे थोड़े से अभ्यास से साधा जा सकता है।
दूसरा चरण
दूसरे चरण में आप को अपने श्वास का भी साथ साथ ध्यान करना है। इसे नोट करें कि आप का दाहिना स्वर कब , कितनी देर और कितना लम्बा चलता है।
लम्बे से अर्थ है कि श्वास की लम्बाई कितनी रहती है। जब आप जल्दी में रहते हैं आप का श्वास भी जल्दी में रहता है। यदि आप ज्यादातर छाती तक श्वास लेते हैं , तब यह श्रम करते समय इससे कम हो जाता है। उथला हो जाता है। यानि आप श्रम करते समय छाती से ऊपर ही श्वास को वापस भेज देते हैं।
सामान्य परिस्थितियों में यदि इसे रोज किया जाए तो आप को एक क्रम दिखेगा। इस क्रम को नोट करें। आप पाऐंगे कि स्वर कुछ समय में बदल जाता है। याने दाहिने की जगह बाँए स्वर से चलने लगता है।
इससे आप को पता चलता है कि सूर्य स्वर और आप का शरीर आपस में तादात्म्य कैसे स्थापित कर रहा है।
इसे नियन्त्रित किया जा सकता है। शरीर की प्रकृति को बाह्य प्रकृति से निरन्तरता से जोड़े जाने की विधि है।
तीसरा चरण
तीसरे चरण में यही विधि चन्द्र के लिए अपनाई जाती है। रात भर जागने की जरूरत नहीं है। केवल चन्द्र का समय और चन्द्र की कला का ध्यान रखना है। तथा चन्द्र स्वर की गति को नोट करना है।
चौथा चरण
एक सम्पूर्ण मास तक ऊपरी चरणों का अभ्यास करने के बाद , आपको एक रोजनामचा बनाना है । अपनी प्रतिदिन कार्यों की लिस्ट सारणी । आगे ध्याना है कि किस गतिविधि में स्वरों का क्या परिवर्तन होता है।
शेष....
Monday, July 31, 2017
आलंब
योग और ध्यान में यह सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु है.
बिन्दु को परिभाषा के अनुसार ही समझें अर्थात बिन्दु में आकार नहीं होता. यानि जिसमें लम्बाई , चौड़ाई और मोटाई नहीं हो वह बिन्दु है यानि इसमें तीनों विमाएँ नहीं होतीं.
हमेशा हम जागते और सोते हुए भी एक बिन्दु पकड़ कर चलते हैं. जहाँ हम अपने आप को स्थित मानते हैं. याने वह बिम्ब जहाँ हम खुद के होने का अपना अस्तित्व मानते हैं.
मोटे तौर पर हम हमेशा खुद को एक बिन्दु पर खडे होकर दुनिया देखते हैं .
यह हमारी पूरी सृष्टि की सबसे महत्वपूर्ण धारणा है.
दश दिशा
विकारों के गर्भ में विचार और विचारों के गर्भ में इच्छाऐं होती हैं ये सभी केवल इन्द्रियों की तुष्टि के लिए स्वरुप पाते हैं.
विचारों के पहले इच्छा और इन्द्रि होती है.
इसका अर्थ ये नहीं कि हम इच्छा और इन्द्रि दोनो को त्याग दें. साधना का अर्थ अभ्यास से समझना ऐसा ज्यादा होता है. इन्द्रियाँ एक tool है जिससे हम अनुभव करते हैं. जब हम इन पर ध्यान करते है. focus करते हैं, तब अपने आप को सृष्टि को विराट को समझते है, अनुभव पाते है.
वाङग्मय के चार तल होते हैं
योग गणपति अथर्वशीर्ष से.
Wednesday, July 26, 2017
योग ईश्वर के साथ तादात्म्य की विधी है
योग का अर्थ है जुड़ना , जोड़ , इसे अलग-अलग ऋषियों ने अलग अपने तरीके से समझा , बताया .
ये परिकल्पना वैदिक काल से चली आ रही है.
वेद व्यास जी ने महाभारत में कृष्ण मुख से योग समझाया.
पातञ्जली जी ने अपना योग बताया.
शिव संहिता में शिव अपने मुख से पार्वती जी को समझाते है.
बुद्ध के वज्रयान का अलग योग है.
Tuesday, July 25, 2017
चक्षौः सूर्यौः अजायतः
आँख का सम्बन्ध सूर्य से होता है.
आठ मिनिट का ध्यान किया जाता है सूर्योदय से ठीक पहले.
आँखों को धो लेना चाहिए . पूर्व दिशा में निमेष खुली आँखें रखकर दृष्टि क्षितिज पर होना चाहिेए. अनुभव करेंगे कि जैसे हम सोकर उठते हैं , वैसे ही कुछ समय सृष्टि भी लगाती है. दृष्टि क्षितिज पर रहती है, पर ध्यान सम्पूर्ण सृष्टि के जागरण पर होता है.
सूर्य के रौद्र होने (किरणें सीधी पडने लगने पर) के ठीक पहले इसे समाप्त कर दिया जाता है.
ईश्वर से तादात्म्य का सबसे जाग्रत उपाय है प्रकृति से तादात्म्य .
सूर्य दृष्टिमान प्रकृति का सबसे शक्तिशाली बिम्ब है.
इसलिए सर्वप्रथम इसे ही आराधना चाहिए.
एक माल ऐसी भी जपें के
साँस लें तो राम छोड़ें तो हनुमान
-
योगासनों में मुद्राओं का बहुत महत्व है। विशेष बन्ध के साथ किए जाने पर ये विशेष लाभ देते हैं। विशेष अंगों को आसनों से स्थिर करके विशेष प्र...
-
काली तारा षोडशी भुवनेश्वरी भैरवी छिन्नमस्ता धूमावती बगलामुखी मातंगी कमला लक्ष्मी का स्वरूप है ये सभी विद्याएं सृष्टि के गूढ़ से गू...
-
इन्द्रियाणां मनो नाथो मनोनाथस्तु मारुतः । मारुतस्य लयो नाथः स लयो नादमाश्रितः ।। --हठ योग प्रदीपिका शिव जी कहते हैं- इन्द्रियों का स्वाम...