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Monday, August 14, 2023

Friday, August 11, 2023

दश महाविद्या

काली 
तारा
 षोडशी 
भुवनेश्वरी 
भैरवी 
छिन्नमस्ता 
धूमावती 

बगलामुखी 
मातंगी
 कमला लक्ष्मी का स्वरूप है 
ये सभी विद्याएं सृष्टि के गूढ़ से गूढ़ रहस्यों को उजागर करती हैं। इन सभी में गुरू का होना आवश्यक इसलिए माना जाता है क्योंकि ये सभी ऐसे अनुभव लेकर आती हैं जो सामान्य से बिल्कुल अलग होते हैं और आपको पता नहीं होता कि इन सबसे कैसे प्रतिसाद किया जाए । 
जैसे एक अबोध बालक को नहीं पता होता कि आग को छूने के नुकसान या तो वह चटखे से पता चलता है या मां से । एक बार पता चलने पर आपको पता है कि कब कैसे करना है। 
पूरे ब्रह्मांड का परिसंचलन इनसे होता है । ये तन्त्र हैं । ये तत्व हैं। 
काली संहार भैरवी सतत संहार कमला नवीन सृष्टि 
हम केवल कल्पना करतें हैं कि हम सब कुछ करते हैं पर सब कुछ किसी तन्त्र से संचालित ही है। जैसे मानव मानव को ही जन सकता है। श्वास की गति भी हमारे नियन्त्रण में नहीं है। पर तन्त्र तो है। यही तन्त्र है। 

ऐसा कहा जाता है कि 64 तन्त्रों से दुनिया चलती है । प्रत्येक महाविद्या इन्ही में से कुछ तन्त्रों का समूह हैं। ये सभी परा हैं यानि केवल इन्द्रियों से ज्ञाप्त नहीं हैं। इन्द्रियों के शोषित से कारिका देते हैं पर ये तिनके के सहारे जितने ही होते हैं। 
जैसे सूर्य का हमें भान होता है प्रकाश का भान होता है पर यह पर क्यों और क्या क्या प्रभाव शरीर पर डालते हैं हमें नहीं पता । 




योग में मुद्रा

 योगासनों में मुद्राओं का बहुत महत्व है। 

विशेष बन्ध के साथ किए जाने पर ये विशेष लाभ देते हैं। विशेष अंगों को आसनों से स्थिर करके विशेष  प्राणायाम कर विशेष बन्ध लगाने के कई फायदे होते हैं। 

उदाहरण 

उत्तानपादासन के साथ यदि कुम्भक किया जाए और अश्व चालिनी मुद्रा भी की जाए, तो यह पेट की सभी समस्याओं में लाभकारी हो जाता है। 



before yoga asana

 few things first

these are not like other exercises, drills, calisthenics. so you need to work out the exact methods and instructions required for sidhdhi of an asana.

yogasana work on the internal vital organs , nadi and nervous system so do not use them like other body exercises.

body requires some time (which is different for different persons) to assimilations.

asana sidhdhi require at least 4 to 6 months. so do not change the asana frequently to mature the benefits that an asana can give.

decide what are your needs from asana 

if you are a sitting for 8 hours on one place personality then start from sarpasana and dhanurasana.

you are moving on a two wheeler all the working hours then start with shavasana and sukhasana.


stretch the body only 75% of your capacity . everyday it will increase the stretch inch by inch . 

so decide your goals first then you can choose asana.

since the asana work on the nadis , it is necessary to get the primary knowledge of the pranayama. if you do follow the instructions on pranayama on each asana the fruitful results are way greater than without the pranayama. 

any food intake should be avoided for at least 3 hours this side and that side of the asana. 





Tuesday, July 26, 2022

शिवरात्रि

शिव का पार्थिव इसी दिन दिखता है शिव शक्ति एक साथ । हम पार्थिवों को शिव तत्व के अनुभव का यही दिन है ।क्यों कि हम इन्द्रिय जनित को ही समझ पाते हैं ।

Saturday, February 12, 2022

काल

काल के मुख्यतः दो अर्थ है 
समय और मृत्यु 
समय में हम एकरेखीय हैं एकमुखी हैं सद्योजात से परे हम कुछ भी नहीं कर सकते । 
मृत्यु को भी इसी काल के पर्याय मे देखते हैं 
भू भूत भभूत और भव क्या है 
भुव और स्वः क्या है?  
हम काल को पञ्च इन्द्रियों से कैसे समझते हैं । 
जब सबकुछ अपनी अपनी गति व वेग से बदलता है तब हम इसे समझ पाते हैं  यानी कि किसी बन्द स्थान में जहां परिवर्तन न दिखे तो समय की भावना भ्रमित हो सकती है अन्तर्याग इसी के अन्तर्गत प्रक्रिया है जो बाहर से किसी भी समय की भावना को रोक देता है सापेक्षता को समाप्त कर देता है ।
इसी के संधान के लिए अलग अलग इंद्रियों को रोका जाकर सीखा जाता है कि एक इंद्री समय को कैसे समझती है और कैसे व्यक्त करती है 
समय को समझने के लिए पलक झपकने पर ध्यान देना चाहिए इसे निमेष कहा जाता है ।
इड़ा गान्धारी कूर्म । पिंगला यशस्विनी नाग।
 

Monday, December 27, 2021

न्यास क्या क्यों और कैसे

 हम किसी भी समय एक आलंब  के सहारे होते हैं प्रत्यक्षण यह आलंब हमें पता नहीं होता इसको सुनिश्चित करने की एक विधि है जिसे न्यास कहते हैं ।
हम अपने आप को अपने शरीर में एक बिंदु पर रखते हैं या समझिए कि शरीर में स्वयं को एक खास जगह पाते और मानते हैं । यहीं से हम पूरी सृष्टि को देखते हैं।  यही आलम्ब हैं। 
न्यास की विधियां शरीर या शरीर के बाहर विशेष स्थानों पर आलम्ब की सृष्टि करने और इसी का अभ्यास करने का अवसर देती हैं। 

न्यास हमें रुद्र , विष्णु, ब्रह्म ( योग सूत्र ) ग्रन्थियों से जगत को देखने का अभ्यास कराता है। हमारे स्वयं के विश्व मे्ं तीन अलग -अलग जगत होते हैं। एक स्थूल शरीर की सृष्टि एक भावनाओं यानि  इन्द्रिय जनित सृष्टि और एक शुद्ध ज्ञान की सृष्टि ( ईश्वर सत्ता का ज्ञान)

विभिन्न न्यासों को करने के पहले प्रत्येक को कुछ रोचक अभ्यास अवश्य करना चाहिए। 

पहला अभ्यास शरीर में ढूंढिेए कि मैं क्या हूं और कहां हुं। क्या मैं शरीर ही बस हुं , क्या मन से मन का सम्वाद कल रहा है वो हुं या या स्वचलित यंत्र । कुछ दिनों के अभ्यास से आपको खुद के बारे में नई जानकारियां मिलेंगी। 

दूसरा अभ्यास  पता किया जाए कि हम कब दांई आंख से ( फोकस) देखते हैं कब वाम अक्षि से इसी तरह नाक , कान आदि
कुछ दिनों के अभ्यास से पता चलेगा कि इसमें एक विशेष क्रम है। जैसे सूर्य का एक चलन है दक्षिणायण उत्तरायण पूर्व पश्चिम आदि एक क्रम है चन्द्र का एक विशेष क्रम है वैसे इन का भी क्रम है । इसे जानने से उसी शरीर में नई सृष्टि दिखेगी। ये दृष्टि विकसित होने से ही न्यास के फायदे हैं और आपको पता रहेगा कि आप क्या प्रयोग कर रहे हैं और क्यों।

तीसरा अभ्यास हमारे शरीर में गति , ऊर्जा तथा विचारों का मूल क्या और कहां है। इनका केंद्र बिन्दु एक है या कई हैं किसका कहां है। यह अभ्यास आपको एक नया दृष्टिकोण देगा।  शरीर और मन को साधना सरल करेगा। 


चौथा अभ्यास  पता कीजिए कि शरीर का सन्तुलन कैसा है एक पैर पर कब तक खड़े रह सकते हैं , क्या पैरों की तरह हाथों पर खड़े रह सकते हैं , क्या सिर के बल खड़े रह सकते हैं इत्यादि  कुछ भी जो आपको सन्तुलन का संघर्ष पैदा करे, तब यह देखें कि क्या अब भी आलम्ब वही है यदि बदला है तो क्या और क्यों । 

अब न्यास की तरफ बढते हैं 
शरीर के अंगों की गिनती कीजिए  एक ही क्म से कई बार । करते समय उस अंग पर ध्यान लगाईए उस के हालचाल लीजिए क्या दर्द है कोई नाड़ी सुनाई दे रही है क्या कोई कमजोरी है इत्यादि । छोटेि मोटेि व्याधियां केवल इतना करते रहने से ही ठीक हो जाती हैं। कुछ एक बार में ही ठीक हो जाएंगी कुछ थोड़ा समय लेंगी। 

 बस ध्यान देने से। 

 और प्रयोग करना है तो शरीर के अंग को पूर्ण शिथिल होने का आदेश दीजिए जब तक आप बाकी शरीर से घूम कर नहीं आते। 

अगला अभ्यास  हमारे कई अंग जो़ड़े से हैं जैसे बायां हाथ दायां हाथ , पैर, आंखें , कान इत्यादि पहले दांया फिर बांया फिर अगला जोड़ा  क्रिस क्रास । यह अभ्यास कई विकृतियों को ठीक करता है जो शरीर की प्रकृति से पैदा होती हैं। जैसे हम दांए या बांए  हाथ से ही लिखते हैं , एक तरफ से चबाते हैं बांई करवट ज्यादा सोते हैं इत्यादि, यह सभी का व्यक्तिगत अलग होता है ।   यह अभ्म्यास साम्य लाता है, सन्तुलन लाता है और कई विकारों को ठीक करता है। 


इन अभ्यासों को कुछ दिनों तक करने के बाद आपको पूर्वाभास हो जायगा कि न्यास क्यों 

अब कैसे पर आते हैं  सामान्य न्यास अनेक प्रकार से विभाजित किए जा सकते  हैं 
 अन्तर्जगत  तथा  बहिर्जगत 
अन्तर्जगत  यानि शरीर में जैसे कर न्यास , षडंग न्यास रुद्र न्यास 
बहिर्जगत  यानि सृष्टि में जैसे तत्व न्यास , षोढ़ा न्यास , नक्षत्र न्यास, महाषोढ़ा न्यास 

क्रम एवं चक्र

ब्रह्मांड में सब परिवर्तनशील है अनंत तथा अनादि केवल ईश्वरीय सत्ता है

बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक सब कुछ बदलता रहता है  बाल गिरते रहते हैं फिर नये आते हैं ऐसा पूरे शरीर के साथ है वरन पूरे ब्रह्मांड के साथ है 
यह परिवर्तन सतत है नया होना सृष्टि है और पुराना समाप्त होना लय इन दोनों का एक साथ सतत होते रहना स्थिति है 

स्थिति
लय 
सृष्टि





कर ह्रद ऋषि मात्रका 
षोढ़ा 
चक्र 
स्थिति लय सृष्टि 
राशि गृह नक्षत्र 
जगत्वशीकरण सम्मोहन वाग्न्यास 
आम्नाय दृष्टि 
मुण्ड 
पीठ 
तत्व 
तत्व; प्राण ; नाड़ी; कारण; देवता 
सूर्य  द्वादश कला चन्द्र षोडश कला  अग्नि दश  कला 
काली न्यास 
अन्यान्य देवी देवता न्यास 
रुद्र न्यास 
अ आ अ आ इ आ इ ई इ ई उ ई आदि 

Sunday, December 12, 2021

सम्पुट

सम्पुट दोनों हथेलियों को जोड़ने से बनती मुद्रा है । 
वाम दक्षिण दोनों को सम में लाने की मुद्रा, तीनों तलों (रुद्र, विष्णु ब्रह्म) पर भी।
हमारा शरीर स्थूल और सूक्ष्म दोनों ही रूप में 

Wednesday, December 19, 2018

दक्षिण यम की दिशा मानी जाती है।
पूर्वज पुरखों की दिशा होती है।
मृत्यु की दिशा होती है।
अमात्य की दिशा होती है।
च सामाजिक नैतिकता
(क) अहिंसा - शब्दों से, विचारों से और कर्मों से किसी को अकारण हानि नहीं पहुँचाना
(ख) सत्य - विचारों में सत्यता, परम-सत्य में स्थित रहना, जैसा विचार मन में है वैसा ही प्रामाणिक बातें वाणी से बोलना
(ग) अस्तेय - चोर-प्रवृति का न होना
(घ) ब्रह्मचर्य - दो अर्थ हैं:
  • चेतना को ब्रह्म के ज्ञान में स्थिर करना
  • सभी इन्द्रिय-जनित सुखों में संयम बरतना
(च) अपरिग्रह - आवश्यकता से अधिक संचय नहीं करना और दूसरों की वस्तुओं की इच्छा नहीं करना

विश्वकर्मा (त्वष्टा) – की पुत्री संज्ञा (त्वाष्ट्री) – से जब सूर्य का विवाह हुआ तब अपनी प्रथम तीन सन्तानों वैवस्वत मनु, यम तथा यमी (यमुना) – की उत्पत्ति के बाद उनके तेज को न सह सकने के कारण संज्ञा अपने ही रूप-आकृति तथा वर्णवाली अपनी छाया को वहाँ स्थापित कर अपने पिता के घर होती हुई ‘उत्तरकुरु’ में जाकर छिपकर वडवा (अश्वा) – का रूप धारण कर अपनी शक्त्ति वृद्धि के लिये कठोर तप करने लगी। इधर सूर्य ने छाया को ही पत्नी समझ तथा उसमें उन्हें सावर्णि मनु, शनि, तपती, तथा विष्टि (भद्रा) – ये चार सन्तानें हुईं। जिन्हें वह अधिक प्यार करती, किन्तु संज्ञा की सन्तानों वैवस्वत मनु तथा यम एवं यमी का निरन्तर तिरस्कार करती रहती।
माता छाया के तिरस्कार से दुःखी होकर एक दिन यम ने पिता सूर्य से कहा – तात! यह छाया हम लोगों की माता नहीं हो सकती; कयोंकि यह हमारी सदा उपेक्षा, ताड़न करती है और सावर्णि मनु आदि को अधिक प्यार करती है। यहाँ तक कि उसने मुझे शाप भी दे डाला है। सन्तान माता का कितना ही अनिष्ट करे, किन्तु वह अपनी सन्तान को कभी शाप नहीं दे सकती। यम की बातें सुनकर कुपित हुये सूर्य ने छाया से ऐसे व्यवहार का कारण पूछा और कहा – सच-सच बताओ तुम कौन हो ? यह सुनकर छाया भयभीत हो गयी और उसने सारा रहस्य प्रकट कर दिया कि मैं संज्ञा नहीं, बल्कि उसकी छाया हूँ।
सूर्य तत्काल संज्ञा को खोजते हुये विश्वकर्मा के घर पहुँचे। उन्होंने बताया कि भगवान् ! आपका तेज सहन न कर सकने के कारण संज्ञा अश्वा (घोड़ी) – का रूप धारण कर उत्तरकुरु में तपस्या कर रही है। तब विश्वकर्मा ने सूर्य की इच्छा पर उनके तेज को खरादकर कम कर दिया। अब सौम्य शक्त्ति से सम्पन्न भगवान् सूर्य अश्वरूप से वडवा (संज्ञा-अश्विनी)- के पास उससे मिले। वडवा ने पर पुरुष के स्पर्श की आशङ्का से सूर्य का तेज अपने नासा छिद्रों से बाहर फेंक दिया। उसी से दोनों अश्विनी कुमारों की उत्पत्ति हुई, जो देवताओं के वैद्ध हुये। नासों से उत्पन्न होने के कारण उनका नाम नासत्य भी है। तेज के अन्तिम अंश से रेवन्त नामक पुत्र हुआ। इस प्रकार भगवान् सूर्य का विशाल परिवार यथास्थान प्रतिष्ठित हो गया। यथा-वैवस्वत मनु वर्तमान (सातवें) मन्वन्तर के अधिपति हैं। यम यमराज एवं धर्मराज के रूप में जीवों के शुभाशुभ कर्मों के फलों को देने वाले हैं। यमी यमुना नदी के रूप में जीवों के उद्धार में लगी हैं। अश्विनी कुमार (नासत्य-दस्त्र) देवताओं के वैद्ध हैं। रेवन्त निरन्तर भगवान् सूर्य की सेवा में रहते हैं। सूर्य पुत्र शनि ग्रहों में प्रतिष्ठित हैं। सूर्य कन्या तपती का विवाह सोमवंशी अत्यन्त धर्मात्मा राजा संवरण के साथ हुआ, जिन से कुरुवंश के स्थापक राजर्षि कुरु का जन्म हुआ। इन्हीं से कौरवों की उत्पत्ति हुई। विष्टि भद्रा नाम से नक्षत्र लोक में प्रविष्ट हुई। सावर्णि मनु आठवें मन्वन्तर के अधिपति होंगे। इस प्रकार भगवान् सूर्य का विस्तार अनेक रूपों में हूआ है। वे आरोग्य के अधिदेवता हैं –
‘आरोग्यं भास्करादिच्छेत्’ (मत्स्यप्0 68/41)
(गीता प्रैॅस द्वारा प्रकाशित कल्याण पत्रिका से लिया गया)

Wednesday, August 23, 2017

lullaby of the God

I call it lullaby of the God- gift of the god . the breath . the controlling switch of the body. 

breath has been studied as a separate subject in India  from ancient times at length. 

the breath has two parts the air itself and the life contained in the air.
गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् 
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपव्हये श्रियम् ।।      --श्रीसूक्त

Invitation to you Goddess . with each breath you incessantly strengthen life to us . the life part in all living bodies. 

for the air part we call it shwas श्वास  and for the life part of the air we call it प्राण.  that is why pranayam is not simply the inhaling and exhaling exercise. the important part is the attention towards the life part. 

In a single breath cycle there are five different stages of this life part. 

PRAN 
APAN 
VYAN
UDAN 
SAMAN 

when the air travels, is churned through, these five stages the life is bestowed to the BRAHMA the living essence of our existence.



   




  


shavasan

The name suggests resemblance to the dead. 

You are required to pose as dead. First chapter should be about the body and the second is about the mind. 

Shavasan is most important before any ASANA because it is suggested you do the shavasan immediately after you complete your session of other ASANA. Because ASANA does not only work on muscles, it first works on the internal organs. Many a times we are unable to sense the excitement that it creates on these organs immediately. But it is necessary that we relax them in the proper manner. 

You will observe that this first of all regulates the sleep. If justifies the required time of sleep. If you are spending sleepless nights, this is exactly for you. If you feel sleepy all the time this is again exact medicine for you. So it calms you and energizes you whichever is required for the body. This is the best part of this ASANA. 

After practice it also shortens your sleep time without causing any adverse effect on you. 
When you are able to do shavasan with the mind you can complete your sleep in a short nap's time. 

Secondly it teaches you to bury tensions. It teaches you to cut-off from the present situation, not only when you are practicing this but at any time.

The beauty of this ASANA is that you can observe it at any time of the day, anywhere and in any position of the body.  

You can understand what parts of the body are over-exercised and what parts are not being used for some time or quite some time. You can design your ASANA accordingly for relaxing and exercising the right course.
Start the first session while sitting in a comfortable position. by first method which is popularly quoted is to relax your body from toes to the head by serially acquiring peace at each limb. 

second method is little different. we very well know breath governs the activity and vice versa. when you are tense your breath length becomes shorter and faster. and vice versa. so the method is to lengthen your breath increasing it comfortably ( without having to make any extra effort) first watch the length of your breath for some time then let it be deeper and more deeper with each breath . you can feel the breath reaching to all your limbs after a few days practice. Now turn your speed of the breath slower and again you need to do this effortlessly one by one with each breath turning slower than the earlier one. you will reach to a level when you will fall asleep. 

this will automatically erase tensions of the body. 

I call it lullaby of the God- the gift of the god . the breath . the controlling switch of the body. 


third method is by kumbhak a method of pranayam. Kumbhak is in street language is to stop the breath either holding the breath air inside(anter kumbhak) or holding breath  air outside(bahya kumbhak).  before starting on this method consult physician about holding breath does not make any problem to you . 

start by tightening your body at the maximum possible. take a deep breath and hold the breath inside at least for a three normal breath lengths . this length varies with different body. release both at the same time forcefully. ideally at 1/3rd of the time you normally breath. loosen all the body parts at once. do not inhale air for again for 1/3rd of the time you normally breath. then start normal breathing. you achieve the same relaxing position as in the first method but in a few seconds. 








Saturday, August 5, 2017

मौसमी सर्दी को बिना दवा के योग से ठीक कर सकते हैं।

मौसम के बदलाव से होने वाली सर्दी खाँसी हल्का बुखार होना आम बात है। इसके लिए महंगी दवाओं की ज़रूरत नहीं है। खासकर  जो दवाएँ ड्राइव करने से मना करती हैं। इन दवाओं का असर थोड़ी देर तक ही रहता है। और दो तीन दिनों से लेकर सप्ताह भर तक समस्या बनी रहती है। इसे थोड़े से ध्यान से भी ठीक किया जा सकता है।


किसी भी ऐसे आसन में बैठें जिसमें आप की रीढ़ पृथ्वी से 90 डिग्री पर रहे। रीढ सीधी रख कर , श्वास धीमा और गहरा करें।  सारे शरीर को ढीला करें। ध्यान को उस जगह पर ले आऐं जहाँ मुख नली और श्वास नली मिलती हैं। चेहरे को क्षितिज रेखा (horizontal plane)से लगभग 23 डिग्री उपर उठा लें । एक बार मुँह और एक बार बाँयी नाक से श्वास लेने का क्रम स्थापित करें। यह जरुरी है कि श्वास में जोर न लगाया जाय। 
केवल इतना क्रम दिन में तीन चार बार दुहरा लेने से समस्या हल हो जाती है। 


हठ योग सूत्र से मन का कण्ट्रोल

इन्द्रियाणां मनो नाथो मनोनाथस्तु मारुतः ।
मारुतस्य लयो नाथः स लयो नादमाश्रितः ।। --हठ योग प्रदीपिका

शिव जी कहते हैं- इन्द्रियों का स्वामी मन होता है । मन का स्वामी श्वास होता है। 
श्वास का स्वामी लय है। यह लय नाद पर आश्रित है। 

गूढ़ सूत्र बहुत कुछ बहुत थोड़े में कहता है। 
विपरीत दिशा से पढ़ें  तो नाद की सिद्धि आपको जीवन की , मन की , शरीर की , प्रकृति से तादात्म्य की लय देता है। नाद की साधना से आप लय rhythm को पा सकते हैं । लय श्वास पर अधिकार की कु़ञ्जी , चाबी है। इसी श्वास से मन संचालित होता है। 

यदि श्वास की लयबद्धता को पा लिया तो , मन का साधन मिल जाता है। प्रत्येक शरीर का एक नैचुरल rhythmic pattern होता है। सूत्र की मानें तो बहुत कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। अपने श्वास के इस सहज पैटर्न को ध्यान में लाना है। श्वास की कुछ विशेषताओं पर गौर करना है। चन्द्र और सूर्य स्वर का पैटर्न, श्वास की गति, श्वास की गहराई और इसका बदलाव भर ध्यान में लाना है। 



Thursday, August 3, 2017

सूर्य और चन्द्र दोनों प्रकृति में हमारे समय का मापदण्ड तय करते हैं

सूर्य और चन्द्र दोनों प्रकृति में हमारे समय का मापदण्ड तय करते हैं। 
सूर्य से हम वर्ष की गणना करते हैं। यह वर्ष के ऋतुओं की भी गणना करता है। 
चन्द्र से दिन (तिथि ) की और पखवाडे तथा मास की गणना करते हैं। 
समय को काल भी कहा जाता है। तो यदि हमें काल को समझना है तो सूर्य और चन्द्र को और इनकी गति को ध्यान में लाना आवश्यक है। 
यदि ध्यान किया जाए तो पता चलता है कि हम एक समय मेें एक ही नासाद्वार से श्वास लेते हैं। इसे हम स्वर कहते हैं। दाहिने नासाद्वार के श्वास को सूर्य स्वर और बाँई नाक के श्वास को चन्द्र स्वर कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि सूर्य स्वर सूर्य से तथा चन्द्र स्वर चन्द्र से संचालित होता है। शरीर के तापमान और उससे शरीर में  होने वाले परिवर्तन इन्हीं दोनों सूर्य और चन्द्र से संचालित होते हैं।  
सूर्य ऊष्मा को बढाता है चन्द्र शीतलता को बढाता है। इस ऊष्मा के आवागमन और उसकी गति को नियन्त्रित किया जा सकता है। 
इसे स्वर साधना कहते हैं। 
पहला चरण
इस साधना का पहला चरण है सूर्य का अनुभव . प्रतिदिन आपको सूर्य की गति का ध्यान करना है। प्रारम्भ के लिए आप सूर्योदय सूर्यास्त और मध्यान्न के समय को ध्यान में लाना शुरू करें। कुछ दिनों के अभ्यास से आप पाएंगे कि आप बिना घड़ी देखे इनका सही समय बता सकते हैं। दिन के पूर्ण काल का भी अनुभव करने लगेंगे। दिन के पूर्ण काल को चार भागों में बाँटना शुरू करें । आप पाएँगे कि शुरू में यह विभाजन प्रतिदन थोड़ा थोड़ा बदल जाता है। यह सूर्य की गति के वर्तमान परिवर्तन हैं। इसे थोड़े से अभ्यास से साधा जा सकता है। 
दूसरा चरण

दूसरे चरण में आप को अपने श्वास का भी साथ साथ ध्यान करना है। इसे नोट करें कि आप का दाहिना स्वर कब , कितनी देर और कितना लम्बा चलता है। 
लम्बे से अर्थ है कि श्वास की लम्बाई कितनी रहती है। जब आप जल्दी में रहते हैं आप का श्वास भी जल्दी में रहता है। यदि आप ज्यादातर छाती तक श्वास लेते हैं , तब यह श्रम करते समय इससे कम हो जाता है। उथला हो जाता है। यानि आप श्रम करते समय छाती से ऊपर ही श्वास को वापस भेज देते हैं। 
सामान्य परिस्थितियों में यदि इसे रोज किया जाए तो आप को एक क्रम दिखेगा। इस क्रम को नोट करें। आप पाऐंगे कि स्वर कुछ समय में बदल जाता है। याने दाहिने की जगह बाँए स्वर से चलने लगता है। 
इससे आप को पता चलता है कि सूर्य स्वर और आप का शरीर आपस में तादात्म्य कैसे स्थापित कर रहा है। 

इसे नियन्त्रित किया जा सकता है।  शरीर की प्रकृति को बाह्य प्रकृति से निरन्तरता से जोड़े जाने की विधि है। 

तीसरा चरण 

तीसरे चरण में यही विधि चन्द्र के लिए अपनाई जाती है। रात भर जागने की जरूरत नहीं है। केवल चन्द्र का समय और चन्द्र की कला का ध्यान रखना है। तथा चन्द्र स्वर की गति को नोट करना है। 

चौथा चरण 

एक सम्पूर्ण मास तक ऊपरी चरणों का अभ्यास करने के बाद , आपको एक रोजनामचा बनाना है । अपनी प्रतिदिन कार्यों की  लिस्ट सारणी । आगे ध्याना है कि किस गतिविधि में स्वरों का क्या परिवर्तन होता है। 

शेष.... 

Monday, July 31, 2017

आलंब

आलंब का आशय वह स्थिति परिस्थिति , स्थूल या सूक्ष्म बिम्ब या बिन्दु जहाँ  से हम देखते हैं , गणना करते हैं. pivot point of reference.

योग और ध्यान में यह सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु है.
बिन्दु को परिभाषा के अनुसार ही समझें अर्थात बिन्दु में आकार नहीं होता. यानि जिसमें लम्बाई , चौड़ाई और मोटाई नहीं हो वह बिन्दु है यानि इसमें तीनों विमाएँ नहीं होतीं.

हमेशा हम जागते और सोते हुए भी एक बिन्दु पकड़ कर चलते हैं. जहाँ हम अपने आप को स्थित मानते हैं. याने वह बिम्ब जहाँ हम खुद के होने का अपना अस्तित्व  मानते हैं.

मोटे तौर पर हम हमेशा खुद को एक बिन्दु पर खडे होकर दुनिया देखते हैं .

यह हमारी पूरी सृष्टि की  सबसे महत्वपूर्ण धारणा है. 

दश दिशा

पूर्व दिशा इन्द्र की होती है. इन्हे देवताओं का राजा माना जाता है. जब हम शरीर में देखते हैं. तो समस्त इन्द्रियो से प्रकट मानते हैं. इन्द्रियों को साधना ही इस देवता की शरीरस्थ प्रकट साधना है.
विकारों के गर्भ में विचार और विचारों के गर्भ में इच्छाऐं होती हैं ये सभी केवल इन्द्रियों की तुष्टि के लिए स्वरुप पाते हैं.
विचारों के पहले इच्छा और इन्द्रि होती है.
इसका अर्थ ये नहीं कि हम इच्छा और इन्द्रि दोनो को त्याग दें. साधना का अर्थ अभ्यास से समझना ऐसा ज्यादा होता है. इन्द्रियाँ एक tool है जिससे हम अनुभव करते हैं. जब हम इन पर ध्यान करते है. focus करते हैं, तब अपने आप को सृष्टि को विराट को समझते है, अनुभव पाते है.

चँद्र सोम कुबेर ये सभी एक ही दिशा को उद्बोधित करते हैं- उत्तर . उत्तर इस तरह से प्राप्तियों की दिशा हुई. कुबेर को धन का देवता माना जाता है. सम्पतियों का देवता माना जाता है. सोम विषय का देवता है. चँद्र भाग्य का देवता है. समय का निर्धारक लक्षण है. इन सभी की दिशा उत्तर है. जिसे प्राप्ति की दिशा कहा जाता है. सकर्मक और अकर्मक पुण्य इसी दिशा से लौट कर मिलते हैं. जब हम पूर्व की ओर मुख करते हैं तो यह वाम पक्ष होता है. कहते हैं बाँए हाथ में यही भाग्य लिखा होता है.

वरूण 
यम
नैऋति समाप्ति की दिशा है यह सतत सृष्टि का सन्तुलन बनाने का देवता है । जो भी आप अपने जीवन में नहीं चाहते उसे इस दिशा में रख कर देखिए सतत रखिए तब वह समाप्त होने लगेगा। 

वायु
ईशान यह ज्ञान की दिशा है , ईश्वर का सापेक्ष यहां से मिलेगा। 
अग्नि

 

वाङग्मय के चार तल होते हैं

वाङग्मय के चार तल होते हैं. इन्हें वाकपद कहते हैं.

प्रथम तल वैखरी है. बाहरी विश्व से संवाद . आम भाषा में जोर से बोलना. इस संवाद को दूसरे सुन सकते हैं.

दूसरा तल मध्यमा है.  स्वयं से संवाद . जिसे हम सोचना कहते हैं.  

तीसरा तल पश्यन्ति है. यह वह तल है जिसे हम मन का दृश्य-पटल भी कह सकते हैं. जिसमें संवाद नहीं होता दर्शन होता है. इसका आधा भाग स्थूल और आधा भाग सूक्ष्म होता है.


चौथा तल परा है. व्यष्टि और समष्टि के बीच का तल परा है. बिना साधना के इस तल का अनुभव नहीं होता , इसलिए इसका नाम परा है. ये वह बुद्ध की मुद्रा है जिसमें हम हमेशा उन्हे बैठे हुए देखते हैं. अर्ध-निमेष आँखें . तो मैं विश्व को होते हुए देखता हुँ लेकिन मैं इसमें नहीं हुँ. और मैं अन्तर्जग को भी देखता हुँ. लेकिन मैं इसमें भी नहीं हुँ. शिव-पार्वती की एक साथ आमोद मुद्रा की तस्वीर में भी पार्वती इसी अर्ध-निमेष को इंगित करती हैं.

ये पाश्चात्य विज्ञान के विभाजन  Conscious , sub-conscious and unconscious से बिल्कुल अलग दृष्टि है. क्योंकि इस दृष्टि से ही आपको आलंब को व्यवस्था करने का धरातल मिलता है . एक प्रोग्रेशन है , एक रास्ता है, क्रम है जिसमें एक आलंब की स्थिति स्पष्ट है कि मैं कहाँ हुँ.  तो आपको पता चलता है कि कहाँ से शुरु करना है.



योग गणपति अथर्वशीर्ष से.


गणादिं पूर्वं उच्च आर्य वर्णादिं तदनंतरं.

अर्थात गण पहले होते हैं उच्च आर्य वर्ण यानि जो अक्षर आर्य वर्णमाला के होते हैं जैसे ककहरा देवनागरी , इसके बाद होते हैं. यानि जब हम कोई विचार करते हैं तब वह स्थूल रुप लेने के पहले गण रुप में होता है.

वर्णों की तरह ही गणों को भी 28 गणों में भाजित किया जा सकता है.

याने जब हम सोचते हैं गुजराती मराठी, हिन्दी अंग्रेज़ी, फ़्राँसीसी इत्यादि में , इससे पहले विचार गणों के रुप में होता है. रोटी बेलने के पहले आटे की लोई की तरह. तो thoughts शुरुआत नहीं होते , गण शुरुआत होते हैं. इसलिए गणेश प्रथमेश्वर हैं. किसी भी संकल्प से पूर्व इनकी साधना का विधान किया गया है.


कई अनुवादों में उच्च आर्य वर्ण को जाति ब्राह्मण इत्यादि से 

वर्णित किया जाता है , जो पृथक है. क्योंकि जब वर्ण नाद मन्त्र

 स्वर के संदर्भ में है तब इसकी प्रतीचि मनुष्य जाति से करना 

विषयान्तर होगा.  

Wednesday, July 26, 2017

योग ईश्वर के साथ तादात्म्य की विधी है

योग ईश्वर के साथ तादात्म्य की विधी है
योग का अर्थ है जुड़ना , जोड़ , इसे अलग-अलग ऋषियों ने अलग अपने तरीके से समझा , बताया .
ये परिकल्पना वैदिक काल से चली आ रही है.
वेद व्यास जी ने महाभारत में कृष्ण मुख से योग समझाया.
पातञ्जली जी ने अपना योग बताया.
शिव संहिता में शिव अपने मुख से पार्वती जी को समझाते है.
बुद्ध के वज्रयान का अलग योग है. 

Tuesday, July 25, 2017

चक्षौः सूर्यौः अजायतः

आँख ( या आँखों) से सूर्य ( या कई सूर्य) जनता है( जनते हैं)ः. पुरुष सूक्त
आँख का सम्बन्ध सूर्य से होता है. 
आठ मिनिट का ध्यान किया जाता है सूर्योदय से ठीक पहले. 
आँखों को धो लेना चाहिए . पूर्व दिशा में निमेष खुली आँखें रखकर दृष्टि क्षितिज पर होना चाहिेए. अनुभव करेंगे कि जैसे हम सोकर उठते हैं , वैसे ही कुछ समय सृष्टि भी लगाती है. दृष्टि क्षितिज पर रहती है, पर ध्यान सम्पूर्ण सृष्टि के जागरण पर होता है. 
सूर्य के रौद्र होने (किरणें सीधी पडने लगने पर) के ठीक पहले इसे समाप्त कर दिया जाता है. 

ईश्वर से तादात्म्य का सबसे जाग्रत उपाय है प्रकृति से तादात्म्य . 
सूर्य दृष्टिमान प्रकृति का सबसे शक्तिशाली बिम्ब है. 
इसलिए सर्वप्रथम इसे ही आराधना चाहिए. 


एक माल ऐसी भी जपें के

साँस लें तो राम छोड़ें तो हनुमान